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50 Best Poems On Nature In Hindi - प्रकृति पर कविता


प्रकृति सौंदर्य पर कविता - Read Best Poems On Nature In Hindi. Find Great Collection Of Prakriti Par Kavita In Hindi

best poems on nature in hindi
Best Poems On Nature In Hindi

Best Hindi Poem About Nature



नदियों के बहाव को रोका और उन पर बाँध बना डाले
जगह जगह बहती धाराएँ अब बन के रह गई हैं गंदे नाले
जब धाराएँ सुकड़ गई तो उन सब की धरती कब्जा ली
सीनों पर फ़िर भवन बन गए छोड़ा नहीं कुछ भी खाली
अच्छी वर्षा जब भी होती हैं पानी बाँधो से छोड़ा जाता है
वो ही तो फ़िर धारा के सीनों पर भवनों में घुस जाता हैं
इसे प्राकृतिक आपदा कहकर सब बाढ़ बाढ़ चिल्लाते हैं
मीडिया अफसर नेता मिलकर तब रोटियां खूब पकाते हैं



Poem On Nature


लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का
गर्मी तो अभी दूर है वर्षा ना आएगी
फूलों की महक हर दिशा में फ़ैल जाएगी
पेड़ों में नई पत्तियाँ इठला के फूटेंगी
प्रेम की खातिर सभी सीमाएं टूटेंगी
सरसों के पीले खेत ऐसे लहलहाएंगे
सुख के पल जैसे अब कहीं ना जाएंगे
आकाश में उड़ती हुई पतंग ये कहे
डोरी से मेरा मेल है आदि अनंत का
लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का
ज्ञान की देवी को भी मौसम है ये पसंद
वातवरण में गूंजते है उनकी स्तुति के छंद
स्वर गूंजता है जब मधुर वीणा की तान का
भाग्य ही खुल जाता है हर इक इंसान का
माता के श्वेत वस्त्र यही तो कामना करें
विश्व में इस ऋतु के जैसी सुख शांति रहे
जिसपे भी हो जाए माँ सरस्वती की कृपा
चेहरे पे ओज आ जाता है जैसे एक संत का
लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का



Hindi Poems On Nature


हे भगवान् तेरी बनाई यह धरती , कितनी ही सुन्दर
नए – नए और तरह – तरह के
एक नही कितने ही अनेक रंग !
कोई गुलाबी कहता ,
तो कोई बैंगनी , तो कोई लाल
तपती गर्मी मैं
हे भगवान् , तुम्हारा चन्दन जैसे व्रिक्स
सीतल हवा बहाते
खुशी के त्यौहार पर
पूजा के वक़्त पर
हे भगवान् , तुम्हारा पीपल ही
तुम्हारा रूप बनता
तुम्हारे ही रंगो भरे पंछी
नील अम्बर को सुनेहरा बनाते
तेरे चौपाये किसान के साथी बनते
हे भगवान् तुम्हारी यह धरी बड़ी ही मीठी



Poem On Prakriti In Hindi


ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये हवाओ की सरसराहट
ये पेड़ो पर फुदकते चिड़ियों की चहचहाहट
ये समुन्दर की लहरों का शोर
ये बारिश में नाचते सुंदर मोर
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये खुबसूरत चांदनी रात
ये तारों की झिलमिलाती बरसात
ये खिले हुए सुन्दर रंगबिरंगे फूल
ये उड़ते हुए धुल
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये नदियों की कलकल
ये मौसम की हलचल
ये पर्वत की चोटियाँ
ये झींगुर की सीटियाँ
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे



Poem On Nature In Hindi


प्रकृति। धरा पर कुछ भी अपने लिए नहीं करती,
नदियाँ पहाड़ों से अपने लिए नहीं उतरती
चाँद सूरज भी कहाँ अपने लिए चमकते हैं?
प्यार भरे दिल भी दूसरों के लिए धड़कते हैं
फूल- वृक्ष की डाली अपने लिए नहीं फलती,
प्रकृति धरा पर कुछ भी अपने लिए नही करती
मनुज तू ही क्यूं फिर अपने में लगा रहता हैं?
इस धरा की धारा में तू क्यूं नहीं बहता हैं?
यह इक बात है मेरे गले से नहीं उतरती,
प्रकृति तू हमको भी क्यूं अपना -सा नही करती?
प्रकृति धरा पर कुछ भी अपने लिए नहीं करती,
नदियाँ पहाड़ों से अपने लिए नहीं उतरती|
बहे पवन फिर महके उपवन सभी के वास्ते
चले गगन फिर बरसे जल -धन सभी के वास्ते
दिखाती राह सच्चार्इ बने खुशी की परछाई,
करे प्रकाश लौ दीपक की सभी के वास्ते
रोशन आग काले अँधेरों के लिए होती ,
चमक सितारों की भी अपनी लिए नहीं होती।
रात तेरे बाद सुबह होने से नहीं मुकरती,
प्रकृति धरा पर कुछ भी अपने लिए नहीं करती।



Best Hindi Poems On Nature


हैं सुहाना बड़ा तेरा ये जहां,
हैं रंग, प्यार ऑर खुशिया यहां
माना हैं गम, चुभन ऑर दर्द भी,
भुलाकर इन्हें जीते है लोग जिंदगी।
रंग सुनहरा लिए निकले जब रवि,
बिखेर दे सोना तब हर कहीं
हर सुबह लॉटाये एक जिंदगी नयी,
लहलाए खेत में फसले तब वहीं।
भुलकर पतझड को,हो रंगीन जब चमन,
खिले हर कली तब, जीत ले सबका मन
देकर महकभरी मुस्कराहट, फूल भी
बिखेरे तब खुशियों का दामन्
न जाने कहे क्या ये भॉरे,
कान में फूलों ऑर कलियों के
जब ढ्ले शाम सुनहरी,
छा जाए सोना बनकर छतरी,
खोजे आशियां अपना तब हर प्राणी।
चुराकर किरण सुरज से,
निकले चांद तब हॉले से
लेकर आए पॅगाम प्यार का,
फॅलाए तब धुंधला सबेरा
छा गए तारे भी आसमां पर,
चांदनी रात में बना दे चांद,
हर किसी को दिवाना, आशिक ऑर कवि।



Prakriti Se Sambandhit Kavita In Hindi


यह प्रकृति कुछ कहना चाहती हैं
यह प्रकृति कुछ कहना चाहती हैं,
अपने दिल का भेद खोलना चाहती हैं,
भेजती रही है हवाओं द्वारा अपना संदेशा।
ज़रा सुनो तो ! जो वह कहना चाहती हैं।

उसका अरमान ,उसकी चाहत है क्या ?
सिवा आदर के वो कुछ चाहती है क्या ?
बस थोड़ा सा प्यार ,थोड़ा सा ख्याल,
यही तो मात्र मांग है इसकी,
और भला वह हमसे मांगती है क्या ?

यह चंचल नदियां इसका लहराता आँचल,
है काले केश यह काली घटाओं सा बादल,
हरे -भरे वृक्ष ,पेड़ -पौधे और वनस्पतियां,
हरियाली सी साड़ी में लगती है क्या कमाल।
इसका रूप -श्रृंगार हमारी खुशहाली नहीं हैं क्या?

है ताज इसका यह हिमालय पर्वत
उसकी शक्ति-हिम्मत शेष सभी पर्वत
अक्षुण रहे यह तठस्थता व् मजबूती
क्योंकि इसका गर्व है यह सभी पर्वत।
इसका यह गौरव हमारी सुरक्षा नहीं हैं क्या ?

यह रंगीन बदलते हुए मौसम,
शीत ,वसंत ,ग्रीष्म औ सावन,
हमारे जीवन सा परिवर्तन शील यह,
और सुख-दुःख जैसे रात- दिन।
जिनसे मिलता है नित कोई पैगाम नया, क्या ?

इस प्रकृति पर ही यदि निर्भरता है हमारी,
सच मानो तो यही माता भी है हमारी,
हमारे अस्तित्व की परिभाषा अपूर्ण है इसके बिना,
यही जीवनदायिनी व यही मुक्तिदायिनी है हमारी।

अपने ही मूल से नहीं हो रहे हम अनजान क्या
हमें समझाना ही होगा ,अब तक जो ना समझ पाये,
हमारी माता की भाषा/अभिलाषा को क्यों न समझ पाय ,
दिया ही दिया उसने अब तक अपना सर्वस्व, कभी लिया नहीं,
इसके एहसानों , उपकारों का मोल क्यों ना चूका पाये।
आधुनिकता/ उद्योगीकरण ने हमें कृतघ्न नहीं बना दिया क्या?



Poem On Prakriti In Hindi For Class 10


लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का।
गर्मी तो अभी दूर है वर्षा ना आएगी
फूलों की महक हर दिशा में फ़ैल जाएगी।

पेड़ों में नई पत्तियाँ इठला के फूटेंगी
प्रेम की खातिर सभी सीमाएं टूटेंगी।
सरसों के पीले खेत ऐसे लहलहाएंगे
सुख के पल जैसे अब कहीं ना जाएंगे।

आकाश में उड़ती हुई पतंग ये कहे
डोरी से मेरा मेल है आदि अनंत का।
लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का।

ज्ञान की देवी को भी मौसम है ये पसंद
वातवरण में गूंजते है उनकी स्तुति के छंद।
स्वर गूंजता है जब मधुर वीणा की तान का
भाग्य ही खुल जाता है हर इक इंसान का।

माता के श्वेत वस्त्र यही तो कामना करें
विश्व में इस ऋतु के जैसी सुख शांति रहे।
जिसपे भी हो जाए माँ सरस्वती की कृपा
चेहरे पे ओज आ जाता है जैसे एक संत का।

लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का।

Famous Hindi Poems On Nature


काली घटा छाई हैं
लेकर साथ अपने यह
ढेर सारी खुशियां लायी हैं
ठंडी ठंडी सी हवा यह
बहती कहती चली आ रही हैं
काली घटा छाई हैं
कोई आज बरसों बाद खुश हुआ
तो कोई आज खुसी से पकवान बना रहा
बच्चों की टोली यह
कभी छत तो कभी गलियों में
किलकारियां सीटी लगा रहे
काली घटा छाई हैं
जो गिरी धरती पर पहली बूँद
देख ईसको किसान मुस्कराया
संग जग भी झूम रहा
जब चली हवाएँ और तेज
आंधी का यह रूप ले रही
लगता ऐसा कोई क्रांति अब सुरु हो रही
छुपा जो झूट अमीरों का
कहीं गली में गढ़ा तो कहीं
बड़ी बड़ी ईमारत यूँ ड़ह रही
अंकुर जो भूमि में सोये हुए थे
महसूस इस वातावरण को
वो भी अब फूटने लगे
देख बगीचे का माली यह
खुसी से झूम रहा
और कहता काली घटा छाई हैं
साथ अपने यह ढेर सारी खुशियां लायी हैं।

Nature Poem In Hindi


सुन्दर रूप इस धरा का,
आँचल जिसका नीला आकाश,
पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,
उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज।

नदियों-झरनो से छलकता यौवन
सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार
खेत-खलिहानों में लहलाती फसले
बिखराती मंद-मंद मुस्कान।

हाँ, यही तो हैं,……
इस प्रकृति का स्वछंद स्वरुप
प्रफुल्लित जीवन का निष्छल सार।

Famous Poems On Nature In Hindi


हे भगवान् तेरी बनाई यह धरती, कितनी ही सुन्दर
नए – नए और तरह – तरह के
एक नही कितने ही अनेक रंग
कोई गुलाबी कहता
तो कोई बैंगनी, तो कोई लाल
तपती गर्मी मैं
हे भगवान् , तुम्हारा चन्दन जैसे वृक्ष
सीतल हवा बहाते
खुशी के त्यौहार पर
पूजा के वक़्त पर
हे भगवान् , तुम्हारा पीपल ही
तुम्हारा रूप बनता
तुम्हारे ही रंगो भरे पंछी
नील अम्बर को सुनेहरा बनाते
तेरे चौपाये किसान के साथी बनते
हे भगवान् तुम्हारी यह धरी बड़ी ही मीठी

Hindi Poem On Nature For Class 7


माँ की तरह हम पर प्यार लुटाती है प्रकृति
बिना मांगे हमें कितना कुछ देती जाती है प्रकृति।
दिन में सूरज की रोशनी देती है प्रकृति
रात में शीतल चाँदनी लाती है प्रकृति।
भूमिगत जल से हमारी प्यास बुझाती है प्रकृति
और बारिश में रिमझिम जल बरसाती है प्रकृति।
दिन-रात प्राणदायिनी हवा चलाती है प्रकृति
मुफ्त में हमें ढेरों साधन उपलब्ध कराती है प्रकृति।
कहीं रेगिस्तान तो कहीं बर्फ बिछा रखे हैं इसने
कहीं पर्वत खड़े किए तो कहीं नदी बहा रखे हैं इसने।
कहीं गहरे खाई खोदे तो कहीं बंजर जमीन बना रखे हैं इसने
कहीं फूलों की वादियाँ बसाई तो कहीं हरियाली की चादर बिछाई है इसने।
मानव इसका उपयोग करे इससे, इसे कोई ऐतराज नहीं
लेकिन मानव इसकी सीमाओं को तोड़े यह इसको मंजूर नहीं।
जब-जब मानव उदंडता करता है, तब-तब चेतवानी देती है यह
जब-जब इसकी चेतावनी नजरअंदाज की जाती है, तब-तब सजा देती है यह।
विकास की दौड़ में प्रकृति को नजरंदाज करना बुद्धिमानी नहीं है
क्योंकि सवाल है हमारे भविष्य का, यह कोई खेल-कहानी नहीं है।
मानव प्रकृति के अनुसार चले यही मानव के हित में है
प्रकृति का सम्मान करें सब, यही हमारे हित में है।

Poem On Nature In Hindi For Class 8


बागो में जब बहार आने लगे,
कोयल अपना गीत सुनाने लगे,
कलियों में निखार छाने लगे,
भँवरे जब उन पर मंडराने लगे,
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया।

खेतो में फसल पकने लगे,
खेत खलिहान लहलाने लगे,
डाली पे फूल मुस्काने लगे,,
चारो और खुशबु फैलाने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया।

आमो पे बौर जब आने लगे,
पुष्प मधु से भर जाने लगे,
भीनी भीनी सुगंध आने लगे,
तितलियाँ उनपे मंडराने लगे,
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया।

सरसो पे पीले पुष्प दिखने लगे,
वृक्षों में नई कोंपले खिलने लगे,
प्रकृति सौंदर्य छटा बिखरने लगे,
वायु भी सुहानी जब बहने लगे,
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया।

धूप जब मीठी लगने लगे,
सर्दी कुछ कम लगने लगे,
मौसम में बहार आने लगे,
ऋतु दिल को लुभाने लगे,
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया।

चाँद भी जब खिड़की से झाकने लगे,
चुनरी सितारों की झिलमिलाने लगे,
योवन जब फाग गीत गुनगुनाने लगे,
चेहरों पर रंग अबीर गुलाल छाने लगे,
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया।

Hindi Poem On Prakriti Soundarya


ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये हवाओ की सरसराहट,
ये पेड़ो पर फुदकते चिड़ियों की चहचहाहट,
ये समुन्दर की लहरों का शोर,
ये बारिश में नाचते सुंदर मोर,
कुछ कहना चाहती है हमसे,
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे।।

ये खुबसूरत चांदनी रात,
ये तारों की झिलमिलाती बरसात,
ये खिले हुए सुन्दर रंगबिरंगे फूल,
ये उड़ते हुए धुल,
कुछ कहना चाहती है हमसे,
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे।।

ये नदियों की कलकल,
ये मौसम की हलचल,
ये पर्वत की चोटियाँ,
ये झींगुर की सीटियाँ,
कुछ कहना चाहती है हमसे,
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे।।

Prakriti Se Sambandhit Kavita


क्या प्राकृतिक की गीत है,
क्या मधुर सी संगीत है,
क्या गुनगुनी सी अवाज,
क्या हवो के झोके से थकान हरने वाली मुस्कान।।

Poem About Nature


क्या प्राकृतिक की गीत है,
क्या मधुर सी संगीत है ,
क्या गुनगुनी सी आवाज,
क्या हवाओ की मुस्कान,
क्या दीपको सा प्रकाश,
क्या पक्षीयों का गान,
क्या सूर्य की किरण ,
क्या सुबह का वो सूर्य प्रणाम,
क्या पूर्णिमा की चाँद,
क्या सीतारों से बिछा आसमान,
क्या बादलो से सजा आकाश ,
क्या बादलों से निकलते फौवारों कि बूंदे,
क्या फूलों की सुन्दरता,
क्या फूलों की सुग्धों भरा स्वभाव,
क्या लहरो का सागर,
क्या गुनगुनी सागर की आवाज,
क्या खामोसीयो भरी रात,
क्या चाँद कि वो मुस्कान,
क्या सुबह की वो लालीमा,
क्या धूप भरी छाव,
क्या संगीतो से भरा गान,
क्या प्राकृतिक की गीत ,
क्या मधुर सी संगीत ,
ये है प्रकृतिक वरदान।

Poem Related To Nature In Hindi


सूर्य कि किरण है सबसे प्यारी,
ना होती तो होती अंधियारी,
ना कोई वृक्ष ना कोई पौधा
ना होता जीवन ऐसा,
ना होती प्रकृतिक हमारी,
जिन्हे देख होती हैरानी,
ना होते बिखरते मोती और कलियाँ,
यहाँ होता पानी ही पानी,
ना होती जीवन की लडीयाँ,
खिला -खिला है जीवन देखो,
देखो सूर्य की किरण को देखो।।

Simple Poems On Nature


होती है रात, होता है दिऩ
पऱ न होते एकसाथ दोनों
प्रक्रुति में, मगर होती है
कही अजब है यही |
और कही नहीं यारों
होती है हमारी ज़िन्दगी में
रात ही रह जाता है अक्सर
दिन को दूर भगाकर |
एक के बाद एक नहीं,
बदलाव निश्चित नहीं,
लगता सिर्फ में नहीं सोचती यह,
लगता पूरी दुनिया सोचती है|
इसलिए तो प्रकृति को करते बर्बाद
क्योंकि जलते है प्रकृति माँ से
प्रकृति माँ की आँखों से आती आरज़ू
जो रुकने का नाम नहीं ले रही हे |
जो हम सब से कह रहे हे
अगर तुम मुझसे कुछ लेना चाहो
तो ख़ुशी-ख़ुशी ले लो
मगर जितना चाहे उतना ही लेलो |
यह पेड़- पौडे, जल, मिटटी, वन सब
तेरी तरह मेरे ही संतान हे
अपने भाईयों को चैन से जीने दो
गले लगाओ सादगी को मत बनो मतलबी |
लेकिन कौन सुननेवाला है यह?
कौन हमारी मा की आरज़ू पोछ सकत॓ है?

Hindi Poems On Nature For Class 10


जब भास्कर आते है खुशियों का दिप जलाते है !
जब भास्कर आते है अन्धकार भगाते है !!
जब सारथी अरुण क्रोध से लाल आता !
तब सारा विश्व खुशियों से नहाता !!
वह लोगो को प्रहरी की भांती जगाये !
लोगो के मन मे खुशियों का दिप जलाये !!
जब सारा विश्व सो रहा होता है !
वह दुनिया को जगा रहा होता है !!
उसके तेज से है सभी घबराते !
उसके आगे कोई टिक नही पाते !!
उसके आने से होता है खुशियों मे संचार !
उसके चले जाने से हो जाता अंधकार !!
उसके चले जाने से दुनिया होती निर्जन !
उसके आ जाने से धन्य होता जन-जन !!
यदी शुर्य नही होता यह शोच के हम घबराते !
बिना शुर्य के प्रकाश के हम रह नही पाते !!
शुर्य के आने से अन्धकार घबराता !
उसके तेज के सामने वह टीक नही पाता !!
इनके आने से होता धन्य-धन्य इन्सान !
सभी उन्हे मानते है भगवान !!
जब हिमालय पर आती उनकी लाली !
उनके आ जाने से हिम भी घबराती !!
इनके आ जाने से जीवन मे होता संचार !
आने से इनके होता प्रकाशमान संसार !!

Nature Poems In Hindi


शोर इतनी है यहाँ कि खुद की आवाज दब जाती है
धुंध इतना है कि कुछ भी नज़र नहीं आता।
चकाचौंध में दफन है तारे और चंद्रमा भी
पहले पता होता कि शहर ऐसा होता है……….
तो मैं भूलकर भी कभी शहर नहीं आता।।
खलल इतना है यहाँ दिखावे और बनावटों का
रोना भी चाहूँ तो आंखो से आंसू नहीं आता।
कोई मां तो कोई मासुक की यादों में डूब जाता है।
आकर सोचता है काश! वो शहर नहीं आता।।
इतनी भीड़ है कि खुद को भी पहचानना मुश्किल है
सोचता हूँ कि आईना बनाया क्यूं है जाता।
बदनसीब ही था वो कि गांवो में भूख न मिट सकी।
पेट की जद में न होता तो शहर नहीं आता।।
वक्त इतना भी नहीं कि कभी खुल कर हंस लूं
ठोकरें लगती है तो खुद को संभाला नहीं जाता।
तन्हाई और दर्द की दास्तां से भरी पड़ी है शहर
पहले जान जाता ये सब तो मैं शहर कभी नहीं आता।।
रक्त और स्वेद में यहाँ फर्क नहीं है कोई
शहर में रहकर भी शहर कोई जान नहीं पाता।
ऐसा लगता है सब जानकर अनजान बनते हैं
ऐसे नासमझ शहर में मैं कभी नहीं आता।।

Hindi Poems On Nature For Class 10


ये हल्की हल्की बूँदें , फिर मेरे को छूने को आ गयी
ये नाचती बहती हवाएं , ये मस्त फिज़ाएं
तबी मेरे आँख खुला नही था, न सूरज उठा था
लेकिन ऐहसास आ गयी , की तुम आ गयी
मन को खींच लिया तेरी पायल की चम् चम् आवाज़
जो कानॊ में गूंजे और लगे बहुत खास
और ले आई हे चेहक पंचियों की
बंजर ज़मीन को सांस देती हुई
ये बूँदें जगाये दिल में चाहत
ये बूँदें दे ज़िन्दगी को राहत
आये जो ये मौसम सुहाना

Hindi Poems On Nature For Class 9


आसमान की बाँहो मे
प्यारा सा वो चाँद
ना जाने मुझे क्यों मेरे
साथी सा लग रहा है

खामोश है वो भी
खामोश हूँ मैं भी
सहमा है वो भी
सहमी हूँ मैं भी

कुछ दाग उसके सीने पर
कुछ दाग मेरे सीने पर
जल रहा है वो भी
जल रही हूँ मैं भी

कुछ बादल उसे ढँके हुए
और कुछ मुझे भी
सारी रात वो जागा है
और साथ मे मैं भी

मेरे आस्तित्व मे शामिल है वो
सुख मे और दुख मे भी
फिर भी वो आसमाँ का चाँद है
और मैं……. जमी की हया !

Hindi Poems On Nature For Class 8


ये कैसा हूनर है तुम्हारा
की बहते हुए को बचाकर
सहारा देते हो
और फिर बहा देते हो उसे
उसी झरने में ये कहकर
की वो इक नदी है
और तुम फिर आओगे उससे मिलने
उसका सागर बनकर
फिर ये दूरियाँ ख़त्म हो जाएँगी
ताउम्र के लिए
नदी परेशान रही
जलती रही, सुखती रही
सागर की किस्मत में
नदियाँ ही नदियाँ हैं
उसे परवाह नही
जो कोई नदी उस तक ना पहुँचे
और भी नदियाँ हैं
उसकी हमसफ़र बनने को
एक सदी बीत गयी
नदी के सब्र का बाँध
आज टूट सा गया है
नदी में बाढ़ आया है
आज उसमे आवेग है, उत्साह है
चली है मिलने अपने सागर से
बहा ले गयी अपना सब कुछ साथ
नदी सागर तट पर आ चुकी है
कितना कुछ जानना है, कहना है
तभी सागर ने पूछा
कहो कैसे आना हुआ
जम गयी वो ये सुनकर
कुछ देर के लिए, पर
अंदर की ग्लानि ने फिर से पिघला दिया
नदी ने मौन रहना ही ठीक जाना
सागर के करीब से अपना रुख़ मोड़ लिया
और सोच रही है, ऐसे मिलने से तो बेहतर था
वो अंतहीन इंतज़ार, जो उसे अब भी रहेगा

Hindi Poems For Class 5 On Nature


मेरी निशि की दीपशिखा
कुछ इस प्रकार प्रतीक्षारत है
दिनकर के एक दृष्टि की
ज्यूँ बाँस पर टँगे हुए दीपक
तकते हैं आकाश को
पंचगंगा की घाट पर
जानती हूँ भस्म कर देगी
वो प्रथम दृष्टि भास्कर की
जब होगा प्रभात का आगमन स्न्गिध सोंदर्य के साथ
और शंखनाद तब होगा
घंटियाँ बज उठेंगी
मन मंदिर के कपाट पर
मद्धिम सी स्वर-लहरियां करेंगी आहलादित प्राण
कर विसर्जित निज उर को प्रेम-धारा में
पंचतत्व में विलीन हो जाएगी बाती
और मेरा अस्ताचलगामी सूरज
क्रमशः अस्त होगा
यामिनी के ललाट पर

Poem On Nature In Hindi For Class 7


एक बूंद ने कहा, दूसरी बूंद से
कहां चली तू यूँ मंडराए ?
क्या जाना तूझे दूर देश है,
बन-ठन इतनी संवराए
जरा ठहर ,वो बूंद उसे देख गुर्राई
फिर मस्ती में चल पड़ी, वो खुद पर इतराए,
एक आवारे बादल ने रोका रास्ता उसका,
कहा क्यों हो तुम इतनी बौराए ?
ऐसा क्या इरादा तेरा,
जो हो इतनी घबराए ?
हट जा पगले मेरे रास्ते से,
बोली बूंद जरा मुस्काए,
जो ना माने बात तू मेरी,
तो दूँ मैं तुझे गिराए,
चल पड़ी फिर वो फुरफुराए,
आगे टकराई वो छोटी बूंद से,
छोटी बूंद उसे देख खिलखिलाए,
कहा दीदी चली कहां तुम यूं गुस्साए ?
क्या हुआ झगड़ा किसी से,
जो हो तुम मुंह फुलाए ?
कहा सुन छोटी बात तू मेरी,
जरा ध्यान लगाए,
मैं तो हूं बूंद सावन की कहे जो तू,
तो लूँ खुद में समाए,
बरसे हूं मैं खेत-खलिहानो में,
ताल-सराबर दूं भरमाए,
वर्षा बन धरती पर बरसूं,
प्रकृति को दूं लुभाए,
लोग जोहे हैं राह मेरी,
क्यों हूं मै इतनी देर लगाए ?
सुन छोटी, जाना है जल्दी मुझे,
दूं मैं वन में मोर नचाए,
हर मन में सावन बसे हैं,
जाउं मैं उनका हर्षाए,
हर डाली सूनी पड़ी है,
कह आउं कि लो झूले लगाए,
बाबा बसते कैलाश पर्वत पर,
फिर भी सब शिवालय में जल चढ़ाए,
हर तरफ खुशियाँ दिखें हैं,
दूं मैं दुखों को हटाए,
पर तुम क्यों उदास खड़ी हो,
मेरी बातों पर गंभीरता जताए ?
कहा दीदी ये सब तो ठीक है,
पर लाती तुम क्यों बाढ कहीं पर कहीं सूखा कहाए ?
क्या आती नहीं दया थोड़ी भी,
कि लूं मैं उन्हें बचाय ?
न-न छोटी ऐसा नहीं है,
हर साल आती मैं यही बताए,
प्रकति से न करो छेड़छाड़ तुम,
यही संदेश लोगों को सिखाए,
पर सुनते नही बात एक भी,
किस भाषा उन्हें समझाए ?
समझ गई मैं दीदी तेरी हर भाषा,
अब न ज्यादा वक्त गँवाए,
मैं भी हूं अब संग तुम्हारे,
चलो अपना संदेश धरती पर बरसाए,
कर लो खुद में शामिल तुम,
लो अपनी रुह बसाए,
आओ चलें दोनों धरती पर,
इक-दूजे पर इतराए।

Short Poem On Nature In Hindi


मैं निशि की चंचल
सरिता का प्रवाह
मेरे अघोड़ तप की माया
यदि प्रतीत होती है
किसी रुदाली को शशि की आभा
तो स्वीकार है मुझे ये संपर्क
जाओ पथिक, मार्ग प्रशस्त तुम्हारा
और तजकर राग विहाग
राग खमाज तुम गाओ
मैं मार्गदर्शक तुम्हारी
तुम्हारे जीवन के भोर होने तक

Hindi Poem On Nature By Famous Poets


ये सर्व वीदित है चन्द्र
किस प्रकार लील लिया है
तुम्हारी अपरिमित आभा ने
भूतल के अंधकार को
क्यूँ प्रतीक्षारत हो
रात्रि के यायावर के प्रतिपुष्टि की
वो उनका सत्य है
यामिनी का आत्मसमर्पण
करता है तुम्हारे विजय की घोषणा
पाषाण-पथिक की ज्योत्सना अमर रहे
युगों से इंगित कर रही है
इला की सुकुमार सुलोचना
नही अधिकार चंद्रकिरण को
करे शशांक की आलोचना

Nature Kavithai


संभल जाओ ऐ दुनिया वालो
वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही !
रब करता आगाह हर पल
प्रकृति पर करो घोर अत्यचार नही !!
लगा बारूद पहाड़, पर्वत उड़ाए
स्थल रमणीय सघन रहा नही !
खोद रहा खुद इंसान कब्र अपनी
जैसे जीवन की अब परवाह नही !!

लुप्त हुए अब झील और झरने
वन्यजीवो को मिला मुकाम नही !
मिटा रहा खुद जीवन के अवयव
धरा पर बचा जीव का आधार नहीं !!

नष्ट किये हमने हरे भरे वृक्ष,लताये
दिखे कही हरयाली का अब नाम नही !
लहलाते थे कभी वृक्ष हर आँगन में
बचा शेष उन गलियारों का श्रृंगार नही !

कहा गए हंस और कोयल, गोरैया
गौ माता का घरो में स्थान रहा नही !
जहाँ बहती थी कभी दूध की नदिया
कुंए,नलकूपों में जल का नाम नही !!

तबाह हो रहा सब कुछ निश् दिन
आनंद के आलावा कुछ याद नही
नित नए साधन की खोज में
पर्यावरण का किसी को रहा ध्यान नही !!

विलासिता से शिथिलता खरीदी
करता ईश पर कोई विश्वास नही !
भूल गए पाठ सब रामयण गीता के,
कुरान,बाइबिल किसी को याद नही !!

त्याग रहे नित संस्कार अपने
बुजुर्गो को मिलता सम्मान नही !
देवो की इस पावन धरती पर
बचा धर्म -कर्म का अब नाम नही !!

संभल जाओ ऐ दुनिया वालो
वसुंधरा पे करो घातक प्रहार नही !
रब करता आगाह हर पल
प्रकृति पर करो घोर अत्यचार नही !!

Poem On Nature In English For Class 6


क्यूँ मायूस हो तुम टूटे दरख़्त
क्या हुआ जो तुम्हारी टहनियों में पत्ते नहीं
क्यूँ मन मलीन है तुम्हारा कि
बहारों में नहीं लगते फूल तुम पर
क्यूँ वर्षा ऋतु की बाट जोहते हो
क्यूँ भींग जाने को वृष्टि की कामना करते हो
भूलकर निज पीड़ा देखो उस शहीद को
तजा जिसने प्राण, अपनो की रक्षा को
कब खुद के श्वास बिसरने का
उसने शोक मनाया है
सहेजने को औरों की मुस्कान
अपना शीश गवाया है
क्या हुआ जो नहीं हैं गुंजायमान तुम्हारी शाखें
चिडियों के कलरव से
चीड़ डालो खुद को और बना लेने दो
किसी ग़रीब को अपनी छत
या फिर ले लो निर्वाण किसी मिट्टी के चूल्‍हे में
और पा लो मोक्ष उन भूखे अधरों की मुस्कान में
नहीं हो मायूस जो तुम हो टूटे दरख़्त……

Poem About Nature In Hindi


रह रहकर टूटता रब का कहर
खंडहरों में तब्दील होते शहर
सिहर उठता है बदन
देख आतंक की लहर
आघात से पहली उबरे नहीं
तभी होता प्रहार ठहर ठहर
कैसी उसकी लीला है
ये कैसा उमड़ा प्रकति का क्रोध
विनाश लीला कर
क्यों झुंझलाकर करे प्रकट रोष

अपराधी जब अपराध करे
सजा फिर उसकी सबको क्यों मिले
पापी बैठे दरबारों में
जनमानष को पीड़ा का इनाम मिले

हुआ अत्याचार अविरल
इस जगत जननी पर पहर – पहर
कितना सहती, रखती संयम
आवरण पर निश दिन पड़ता जहर

हुई जो प्रकति संग छेड़छाड़
उसका पुरस्कार हमको पाना होगा
लेकर सीख आपदाओ से
अब तो दुनिया को संभल जाना होगा

कर क्षमायाचना धरा से
पश्चाताप की उठानी होगी लहर
शायद कर सके हर्षित
जगपालक को, रोक सके जो वो कहर

बहुत हो चुकी अब तबाही
बहुत उजड़े घरबार,शहर
कुछ तो करम करो ऐ ईश
अब न ढहाओ तुम कहर !!
अब न ढहाओ तुम कहर !!

Prakriti Soundarya Par Kavita In Hindi


रंग -बिरंगी खिलती कलियाँ,
गूंजे भँवरे उड़ती तितलियाँ ,
सूर्य -किरणे अब फैल गईं ,
कलियों का घूंघट खोल गईं
कली -कली को देख रही ,
देख -देख कर हंस रही,
मस्त पवन का झोंका आया ,
मीठे सुर में गीत सुनाया,
डाली -डाली लगी लहराने,
क्या मस्ती भी लगी छाने ,
देख-देख मन लुभाया ,
कली -कली का मन इतराया,
कितनी कलियाँ एक बगीचा ,
माली ने सब को है सींचा,
सींच-सींच कर बड़ा किया ,
कलियों ने मन हर लिया ,
ए माली मत हाथ लगाना,
कुम्हला न जाएँ इन्हें बचाना,
कली को फूल बदलते देखो ,
महकते फूलों की फुलवारी देखो |

Poem On Nature In Hindi For Kids


लो, फिर आ गया जाड़ों का मौसम ,
पहाड़ों ने ओढ़ ली चादर धूप की
किरणें करने लगी अठखेली झरनों से
चुपके से फिर देख ले उसमें अपना रूप ।

ओस भी इतराने लगी है
सुबह के ताले की चाबी
जो उसके हाथ लगी है ।

भीगे पत्तों को अपने पे
गुरूर हो चला है
आजकल है मालामाल
जेबें मोतियों से भरीं हैं ।

धुंध खेले आँख मिचोली
हवाओं से
फिर थक के सो जाए
वादियों की गोद में ।

आसमान सवरने में मसरूफ है
सूरज इक ज़रा मुस्कुरा दे
तो शाम को
शरमा के सुर्ख लाल हो जाए ।

बर्फीली हवाएं देती थपकियाँ रात को
चुपचाप सो जाए वो
करवट लेकर …

Hindi Kavita On Nature


बाग़ में खुशबू फैल गई , बगिया सारी महक गयी,
रंग-बिरंगे फूल खिले, तितलियाँ चकरा गईं,
लाल ,पीले ,सफ़ेद गुलाब ,गेंदा , जूही ,खिले लाजवाब ,
नई पंखुरियां जाग गयी, बंद कलियाँ झांक रही .
चम्पा , चमेली , सूर्यमुखी , सुखद पवन गीत सुना रही
महकते फूलों की क्यारी , सब के मन को लुभा रही,
धीरे से छू कर देखो खुशबू , तुम पर खुश्बू लुटा रही,
महकते फूलों की डाली, मन ही मन इतरा रही ,
हौले -हौले पाँव धरो, भंवरों की गुंजार बड़ी,
ओस की बूंदे चमक रहीं , पंखुरिया हीरों सी जड़ी,
सब को सजाते महकते फूल , सब को रिझाते महकते फूल,
महकते फूलों से सजे द्वार ,महकते फूल बनते उपहार

Hindi Poem On Nature For Class 3


कोन से साँचो में तूं है बनाता , बनाता है ऐसा तराश-तराश के ,
कोई न बना सके तूं ऐसा बनाता , बनाता है उनमें जान डाल के!

सितारों से भरा बरह्माण्ड रचाया , ना जाने उसमे क्या -क्या है समाया ,
ग्रहों को आकाश में सजाया , ना जाने कैसा अटल है घुमाया ,
जो नित नियम गति से अपनी दिशा में चलते हैं ,
अटूट प्रेम में घूम -घूम के, पल -पल आगे बढ़ते हैं !

सूर्य को है ऐसा बनाया, जिसने पूरी सुृष्टि को चमकाया ,
जो कभी नहीं बुझ पाया ,ना जाने किस ईंधन से जगता है ,
कभी एक शोर , कभी दूसरे शोर से ,
धरती को अभिनदंन करता है !

तारों की फौज ले के , चाँद धरा पे आया ,
कभी आधा , कभी पूरा है चमकाया ,
कभी -कभी सुबह शाम को दिखाया ,
कभी छिप -छिप के निगरानी करता है !

धरती पे माटी को बिखराया ,कई रंगो से इसे सजाया ,
हवा पानी को धरा पे बहाया, सुरमई संगीत बजाया ,
सूर्य ने लालिमा को फैलाया ,दिन -रात का चकर चलाया ,
बदल -बदल के मौसम आया ,कभी सुखा कभी हरियाली लाया !

आयु के मुताबिक सब जीवो को बनाया,
कोई धरा पे , कोई आसमान में उड़ाया ,
किसी को ज़मीन के अंदर है शिपाया ,
सबके ह्रदय में तूं है बसता ,
सबका पोषण तूं ही करता !

अलग़ -अलग़ रुप का आकार बनाया ,
फिर भी सब कुश सामूहिक रचाया ,
सबको है काम पे लगाया ,
नीति नियम से सब कुश है चलाया ,
हर रचना में रहस्य है शिपाया ,
दूृश्य कल्पनाओं में जग बसाया ,
सब कुश धरा पे है उगाया ,
समय की ढ़ाल पे इसमें ही समाया !

जब -जब जग जीवन संकट में आया ,
किसी ने धरा पे उत्पात मचाया ,
बन-बन के मसीहा तूं ही आया ,
दुनिया को सही मार्ग दिखाया ,
तेरे आने का प्रमाण धरा पे ही पाया ,
तेरे चिन्हों पे जग ने शीश झुकाया !

इस जग का तूं ही कर्ता ,
जब चाहे करिश्में करता ,
सब कुश जग में तूं ही घटता ,
पल पल में परिवर्तन करता !

बन बन के फ़रिश्ता धरा पे उतरना ,
इस जग पे उपकार तूँ करना ,
मानव मन में सोच खरी भरना ,
जो पल पल प्रकृति से खिलवाड़ है करता !

Prakriti Poem In Hindi


विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष
यह प्रकृति कुछ कहना चाहती है…..
यह प्रकृति कुछ कहना चाहती है ,
अपने दिल का भेद खोलना चाहती है ,
भेजती रही है हवाओं द्वारा अपना संदेशा।
ज़रा सुनो तो ! जो वह कहना चाहती है।
उसका अरमान ,उसकी चाहत है क्या ?
सिवा आदर के वो कुछ चाहती है क्या ?
बस थोड़ा सा प्यार ,थोड़ा सा ख्याल ,
यही तो मात्र मांग है इसकी ,
और भला वह हमसे मांगती है क्या ?
यह चंचल नदियां इसका लहराता आँचल ,
है काले केश यह काली घटाओं सा बादल ,
हरे -भरे वृक्ष ,पेड़ -पौधे और वनस्पतियां ,
हरियाली सी साड़ी में लगती है क्या कमाल।
इसका रूप -श्रृंगार हमारी खुशहाली नहीं है क्या? …
है ताज इसका यह हिमालय पर्वत ,
उसकी शक्ति-हिम्मत शेष सभी पर्वत ,
अक्षुण रहे यह तठस्थता व् मजबूती ,
क्योंकि इसका गर्व है यह सभी पर्वत।
इसका यह गौरव हमारी सुरक्षा नहीं है क्या ?…..
यह रंगीन बदलते हुए मौसम ,
शीत ,वसंत ,ग्रीष्म औ सावन ,
हमारे जीवन सा परिवर्तन शील यह ,
और सुख-दुःख जैसे रात- दिन।
जिनसे मिलता है नित कोई पैगाम नया , क्या ?….
इस प्रकृति पर ही यदि निर्भरता है हमारी ,
सच मानो तो यही माता भी है हमारी ,
हमारे अस्तित्व की परिभाषा अपूर्ण है इसके बिना ,
यही जीवनदायिनी व यही मुक्तिदायिनी है हमारी।
अपने ही मूल से नहीं हो रहे हम अनजान क्या ?…
हमें समझाना ही होगा ,अब तक जो ना समझ पाये ,
हमारी माता की भाषा/अभिलाषा को क्यों न समझ पाये ,
दिया ही दिया उसने अब तक अपना सर्वस्व ,कभी लिया नहीं ,
इसके एहसानों , उपकारों का मोल क्यों ना चूका पाये।
आधुनिकता/ उद्योगीकरण ने हमें कृतघ्न नहीं बना दिया क्या ?…

Poem On Nature In Hindi For Class 5


इस लहलाती हरियाली से , सजा है ग़ाँव मेरा…..
सोंधी सी खुशबू , बिखेरे हुऐ है ग़ाँव मेरा… !!

जहाँ सूरज भी रोज , नदियों में नहाता है………
आज भी यहाँ मुर्गा ही , बांग लगाकर जगाता है !!

जहाँ गाय चराने वाला ग्वाला , कृष्ण का स्वरुप है …..
जहाँ हर पनहारन मटकी लिए, धरे राधा का रूप है !!

खुद में समेटे प्रकृति को, सदा जीवन ग़ाँव मेरा ….
इंद्रधनुषी रंगो से ओतप्रोत है, ग़ाँव मेरा ..!!

जहाँ सर्दी की रातो में, आले तापते बैठे लोग……..
और गर्मी की रातो में, खटिया बिछाये बैठे लोग !!

जहाँ राम-राम की ही, धव्नि सुबह शाम है………
यहाँ चले न हाय हेलो, हर आने जाने वाले को बस ” सीता राम ” है !!

भजनों और गुम्बतो की मधुर धव्नि से, है संगीतमय गाँव मेरा….
नदियों की कल-कल धव्नि से, भरा हुआ है गाँव मेरा !!

जहाँ लोग पेड़ो की छाँव तले, प्याज रोटी भी मजे से खाते है ……
वो मजे खाना खाने के, इन होटलों में कहाँ आते है !!

जहाँ शीतल जल इन नदियों का, दिल की प्यास बुझाता है …
वो मजा कहाँ इन मधुशाला की बोतलों में आता है…. !!

ईश्वर की हर सौगात से, भरा हुआ है गाँव मेरा …….
कोयल के गीतों और मोर के नृत्य से, संगीत भरा हुआ है गाँव मेरा !!

जहाँ मिटटी की है महक, और पंछियो की है चहक ………
जहाँ भवरों की गुंजन से, गूंज रहा है गाँव मेरा…. !!

प्रकृति की गोद में खुद को समेटे है गाँव मेरा ……….
मेरे भारत देश की शान है, ये गाँव मेरा… !!

Poem On Nature In Hindi In 8 Lines


लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का

गर्मी तो अभी दूर है वर्षा ना आएगी
फूलों की महक हर दिशा में फ़ैल जाएगी
पेड़ों में नई पत्तियाँ इठला के फूटेंगी
प्रेम की खातिर सभी सीमाएं टूटेंगी
सरसों के पीले खेत ऐसे लहलहाएंगे
सुख के पल जैसे अब कहीं ना जाएंगे
आकाश में उड़ती हुई पतंग ये कहे
डोरी से मेरा मेल है आदि अनंत का

लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का

ज्ञान की देवी को भी मौसम है ये पसंद
वातवरण में गूंजते है उनकी स्तुति के छंद
स्वर गूंजता है जब मधुर वीणा की तान का
भाग्य ही खुल जाता है हर इक इंसान का
माता के श्वेत वस्त्र यही तो कामना करें
विश्व में इस ऋतु के जैसी सुख शांति रहे
जिसपे भी हो जाए माँ सरस्वती की कृपा
चेहरे पे ओज आ जाता है जैसे एक संत का

लो आ गया फिर से हँसी मौसम बसंत का
शुरुआत है बस ये निष्ठुर जाड़े के अंत का

Hindi Poem For Class 2 On Nature


धरती माँ कर रही है पुकार ।
पेङ लगाओ यहाँ भरमार ।।
वर्षा के होयेंगे तब अरमान ।
अन्न पैदा होगा भरमार ।।
खूशहाली आयेगी देश में ।
किसान हल चलायेगा खेत में ।।
वृक्ष लगाओ वृक्ष बचाओ ।
हरियाली लाओ देश में ।।
सभी अपने-अपने दिल में सोच लो ।
सभी दस-दस वृक्ष खेत में रोप दो ।।
बारिस होगी फिर तेज ।
मरू प्रदेश का फिर बदलेगा वेश ।।
रेत के धोरे मिट जायेंगे ।
हरियाली राजस्थान मे दिखायेंगे ।।
दुनियां देख करेगी विचार ।
राजस्थान पानी से होगा रिचार्ज ।।
पानी की कमी नही आयेगी ।
धरती माँ फसल खूब सिंचायेगी ।।
खाने को होगा अन्न ।
किसान हो जायेगा धन्य ।।
एक बार फिर कहता है मेरा मन ।
हम सब धरती माँ को पेङ लगाकर करते है टनाटन ।।
“जय धरती माँ”

Hindi Poems On Nature Beauty


हमें तो जब भी कोई फूल नज़र आया है
उसके रूप की कशिश ने हमें लुभाया है
जो तारीफ़ ना करें कुदरती करिश्मों की
क्यों हमने फिर मानव का जन्म पाया है.

Poem On Nature In Hindi Language


सुन्दर रूप इस धरा का,
आँचल जिसका नीला आकाश,
पर्वत जिसका ऊँचा मस्तक,2
उस पर चाँद सूरज की बिंदियों का ताज
नदियों-झरनो से छलकता यौवन
सतरंगी पुष्प-लताओं ने किया श्रृंगार
खेत-खलिहानों में लहलाती फसले
बिखराती मंद-मंद मुस्कान
हाँ, यही तो हैं,……
इस प्रकृति का स्वछंद स्वरुप
प्रफुल्लित जीवन का निष्छल सार

Poem On Nature In Hindi For Class 6


ह्बायों के रुख से लगता है कि रुखसत हो जाएगी बरसात
बेदर्द समां बदलेगा और आँखों से थम जाएगी बरसात .
अब जब थम गयी हैं बरसात तो किसान तरसा पानी को
बो वैठा हैं इसी आस मे कि अब कब आएगी बरसात .
दिल की बगिया को इस मोसम से कोई नहीं रही आस
आजाओ तुम इस बे रूखे मोसम में बन के बरसात .
चांदनी चादर बन ढक लेती हैं जब गलतफेहमियां हर रात
तब सुबह नई किरणों से फिर होती हें खुसिओं की बरसात .
सुबह की पहली किरण जब छू लेती हें तेरी बंद पलकें
चारों तरफ कलिओं से तेरी खुशबू की हो जाती बरसात .
नहा धो कर चमक जाती हर चोटी धोलाधार की
जब पश्चिम से बादल गरजते चमकते बनते बरसात

Easy Poem In Hindi


है महका हुआ गुलाब
खिला हुआ कंवल है,
हर दिल मे है उमंगे
हर लब पे ग़ज़ल है,
ठंडी-शीतल बहे ब्यार
मौसम गया बदल है,
हर डाल ओढ़ा नई चादर
हर कली गई मचल है,
प्रकृति भी हर्षित हुआ जो
हुआ बसंत का आगमन है,
चूजों ने भरी उड़ान जो
गये पर नये निकल है,
है हर गाँव मे कौतूहल
हर दिल गया मचल है,
चखेंगे स्वाद नये अनाज का
पक गये जो फसल है,
त्यौहारों का है मौसम
शादियों का अब लगन है,
लिए पिया मिलन की आस
सज रही “दुल्हन” है,
है महका हुआ गुलाब
खिला हुआ कंवल है…!!

Short Poem On Nature With Rhyming Words


हे ईस्वर तेरी बनाई यह धरती , कितनी ही सुन्दर
नए – नए और तरह – तरह के
एक नही कितने ही अनेक रंग !
कोई गुलाबी कहता ,
तो कोई बैंगनी , तो कोई लाल
तपती गर्मी मैं
हे ईस्वर , तुम्हारा चन्दन जैसे व्रिक्स
सीतल हवा बहाते
खुशी के त्यौहार पर
पूजा के वक़्त पर
हे ईस्वर , तुम्हारा पीपल ही
तुम्हारा रूप बनता
तुम्हारे ही रंगो भरे पंछी
नील अम्बर को सुनेहरा बनाते
तेरे चौपाये किसान के साथी बनते
हे ईस्वर तुम्हारी यह धरी बड़ी ही मीठी

Kavita On Prakriti


कलयुग में अपराध का
बढ़ा अब इतना प्रकोप
आज फिर से काँप उठी
देखो धरती माता की कोख !!

समय समय पर प्रकृति
देती रही कोई न कोई चोट
लालच में इतना अँधा हुआ
मानव को नही रहा कोई खौफ !!

कही बाढ़, कही पर सूखा
कभी महामारी का प्रकोप
यदा कदा धरती हिलती
फिर भूकम्प से मरते बे मौत !!

मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
चढ़ गए भेट राजनितिक के लोभ
वन सम्पदा, नदी पहाड़, झरने
इनको मिटा रहा इंसान हर रोज !!

सबको अपनी चाह लगी है
नहीं रहा प्रकृति का अब शौक
“धर्म” करे जब बाते जनमानस की
दुनिया वालो को लगता है जोक !!

कलयुग में अपराध का
बढ़ा अब इतना प्रकोप
आज फिर से काँप उठी
देखो धरती माता की कोख !!

Small Poems On Nature


काली घटा छाई है
लेकर साथ अपने यह
ढेर सारी खुशियां लायी है
ठंडी ठंडी सी हव यह
बहती कहती चली आ रही है
काली घटा छाई है
कोई आज बरसों बाद खुश हुआ
तो कोई आज खुसी से पकवान बना रहा
बच्चों की टोली यह
कभी छत तो कभी गलियों में
किलकारियां सीटी लगा रहे
काली घटा छाई है
जो गिरी धरती पर पहली बूँद
देख ईसको किसान मुस्कराया
संग जग भी झूम रहा
जब चली हवाएँ और तेज
आंधी का यह रूप ले रही
लगता ऐसा कोई क्रांति अब सुरु हो रही
छुपा जो झूट अमीरों का
कहीं गली में गढ़ा तो कहीं
बड़ी बड़ी ईमारत यूँ ड़ह रही
अंकुर जो भूमि में सोये हुए थे
महसूस इस वातावरण को
वो भी अब फूटने लगे
देख बगीचे का माली यह
खुसी से झूम रहा
और कहता काली घटा छाई है
साथ अपने यह ढेर सारी खुशियां लायी है

Hindi Poems For Class 9 On Nature


माँ की तरह हम पर प्यार लुटाती है प्रकृति
बिना मांगे हमें कितना कुछ देती जाती है प्रकृति…..
दिन में सूरज की रोशनी देती है प्रकृति
रात में शीतल चाँदनी लाती है प्रकृति……
भूमिगत जल से हमारी प्यास बुझाती है प्रकृति
और बारिश में रिमझिम जल बरसाती है प्रकृति…..
दिन-रात प्राणदायिनी हवा चलाती है प्रकृति
मुफ्त में हमें ढेरों साधन उपलब्ध कराती है प्रकृति…..
कहीं रेगिस्तान तो कहीं बर्फ बिछा रखे हैं इसने
कहीं पर्वत खड़े किए तो कहीं नदी बहा रखे हैं इसने…….
कहीं गहरे खाई खोदे तो कहीं बंजर जमीन बना रखे हैं इसने
कहीं फूलों की वादियाँ बसाई तो कहीं हरियाली की चादर बिछाई है इसने.
मानव इसका उपयोग करे इससे, इसे कोई ऐतराज नहीं
लेकिन मानव इसकी सीमाओं को तोड़े यह इसको मंजूर नहीं……..
जब-जब मानव उदंडता करता है, तब-तब चेतवानी देती है यह
जब-जब इसकी चेतावनी नजरअंदाज की जाती है, तब-तब सजा देती है यह….
विकास की दौड़ में प्रकृति को नजरंदाज करना बुद्धिमानी नहीं है
क्योंकि सवाल है हमारे भविष्य का, यह कोई खेल-कहानी नहीं है…..
मानव प्रकृति के अनुसार चले यही मानव के हित में है
प्रकृति का सम्मान करें सब, यही हमारे हित में है

Poems On Nature In Hindi For Class 10


मान लेना वसंत आ गया :
बागो में जब बहार आने लगे
कोयल अपना गीत सुनाने लगे
कलियों में निखार छाने लगे
भँवरे जब उन पर मंडराने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
खेतो में फसल पकने लगे
खेत खलिहान लहलाने लगे
डाली पे फूल मुस्काने लगे
चारो और खुशबु फैलाने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
आमो पे बौर जब आने लगे
पुष्प मधु से भर जाने लगे
भीनी भीनी सुगंध आने लगे
तितलियाँ उनपे मंडराने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
सरसो पे पीले पुष्प दिखने लगे
वृक्षों में नई कोंपले खिलने लगे
प्रकृति सौंदर्य छटा बिखरने लगे
वायु भी सुहानी जब बहने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
धूप जब मीठी लगने लगे
सर्दी कुछ कम लगने लगे
मौसम में बहार आने लगे
ऋतु दिल को लुभाने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!
चाँद भी जब खिड़की से झाकने लगे
चुनरी सितारों की झिलमिलाने लगे
योवन जब फाग गीत गुनगुनाने लगे
चेहरों पर रंग अबीर गुलाल छाने लगे
मान लेना वसंत आ गया… रंग बसंती छा गया !!

Poem On Nature For Class 4


प्रकृति की क्या शान है, कैसे वन उपवन लहराते हैं।

प्रकृति के रंगों को देखकर हम तो अचम्भित हो जाते हैं।

प्रकृति ने हमको सब कुछ दिया है,

लेकिन प्रकृति को हमने क्या दिया है?

प्रकृति ने हमको फल दिए, फूल दिए, वन दिए,

उपवन दिए, समुद्र दिए, झरने दिए, द्विप दिए,

समतल दिए, प्रकृति ने हमे कई रंग दिए,

रहने को घर दिए, अपनी शीतल छाया दी,

मनुष्य को माया दी। आओ आज ये कसम खाते हैं,

प्रकृति को मिलकर बचाते हैं।

प्रकृति की क्या शान है कैसे वन उपवन लहराते हैं।

Poem Based On Nature In Hindi


प्रकृति भी कुछ कहती है
देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है…
समेट लेती है सबको खुद में
कई संदेश देती है
चिडियों की चहचहाहट से
नव भोर का स्वागत करती है
राम राम अभिवादन कर
आशीष सबको दिलाती है
सूरज की किरणों से
नव उमंग सब में
भर देती है
देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है…
आतप में स्वेद बहाकर
परिश्रम करने को कहती है
शीतल हवा के झोंके से
ठंडकता भर देती है
वट वृक्षों की छाया में
विश्राम करने को कहती है
देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है…
मयूर नृत्य से रोमांचित कर
कोयल का गीत सुनाती है
मधुर फलों का सुस्वाद लेकर
आत्म तृप्त कर देती है
सांझ तले गोधूलि बेला में
घर जाने को कहती है
देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है…
संध्या आरती करवाकर
ईश वंदना करवाती है
छिपते सूरज को नमन कर
चांद का अातिथ्य करती है
टिमटिमाते तारों के साथ
अठखेलियां करने को कहती है
रजनी के संग विश्राम करने
चुपके से सो जाती है
देखो,प्रकृति भी कुछ कहती है …

Hindi Poems For Class 6th On Nature

प्रकृति ने अच्छा दृश्य रचा
इसका उपभोग करें मानव।
प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करके
हम क्यों बन रहे हैं दानव।
ऊँचे वृक्ष घने जंगल ये
सब हैं प्रकृति के वरदान।
इसे नष्ट करने के लिए
तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
इस धरती ने सोना उगला
उगलें हैं हीरों के खान
इसे नष्ट करने के लिए
तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
धरती हमारी माता है
हमें कहते हैं वेद पुराण
इसे नष्ट करने के लिए
तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।
हमने अपने कर्मों से
हरियाली को कर डाला शमशान
इसे नष्ट करने के लिए
तत्पर खड़ा है क्यों इंसान।

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