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Top 25 Tulsidas Ji Ke Dohe in Hindi With Meaning


तुलसीदास के दोहे हिन्दी मे अर्थ सहित - Read Best Dohe Of Tulsidas in Hindi.

tulsidas ke dohe with meaning
Tulsidas Ke Dohe With Meaning

Tulsidas Dohe On Wisdon - तुलसीदास के दोहे विवेक पर 



बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें।कर्म कि होहिं स्वरूपहिं चीन्हें।
काहू सुमति कि खल संग जामी।सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।



ब्राम्हण का अहित करने पर बंश का नाश होता है।
बिना आत्मज्ञान के अनासक्ति पूर्वक कर्म नही हो सकता।
दुश्ट की संगति से सुबुद्धि नही उत्पन्न हो सकती है।
परस्त्री गमन करने बालों को उत्तम गति नही मिल सकती है।

tulsidas ke dohe ramcharitmanas
Tulsidas Ke Dohe Ramcharitmanas

2

कबहु कि दुख सब कर हित ताकें।तेहि कि दरिद्र परसमनि जाकें।
परद्रोही की होहिं निसंका।कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।



सबकी भलाई चाहने से कभी दुख नही हो सकता।
पारसमणि के स्वामी के पास गरीबी नही रह सकती।
दूसरों से बिरोध करने बाले कभी भयमुक्त नही रह सकते।
कामी पुरूश कभी कलंक रहित नही रह सकता है।

ramayan dohe in hindi
Ramayan Dohe In Hindi

3

क्रोध कि द्वैतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान
मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान।



बिना द्वैतबुद्धि के क्रोध नही होता और बिना अज्ञान के द्वैत बुद्धि नही हो सकती।
माया के बशीभूत जड़ जीव क्या कभी ईश्वर के समानहो सकता है।

tulsidas ke dohe on paropakar
Tulsidas Ke Dohe On Paropakar

4

अघ कि पिसुनता सम कछु आना।धर्म कि दया सरिस हरि जाना।



चुगलखोरी के समान अन्य कोई पाप नही है।दया के समान दूसरा कोई धर्म नही है।

tulsidas ke dohe on friendship
Tulsidas Ke Dohe On Friendship

5

पावन जस कि पुन्य बिनु होई।बिनु अघ अजस कि पावई कोई।
लाभु कि किछु हरि भगति समाना।जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।



विना पुण्य के पवित्र यश प्रतिश्ठा नही मिल सकती।
बिना पाप के अपयश नहीं मिल सकता है।ई्रश्वर भक्ति के समान दूसरा लाभ नही है।
ऐसा बेद पुराण सभी धर्मग्रंथ कहते हैं।

Tulsidas Dohe On Friendship - तुलसीदास के दोहे दोस्ती पर


6

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक।सुखी कि होहिं कबहुॅ हरि निंदक।
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें।अघ कि रहहिं हरि चरित बखाने।

ईश्वर को जानने बाले जन्म मृत्यु के चक्र में नही पड़ते।
प्रभु की निंदा करने बाले कभी सुखी नही रह सकते।
राज्य बिना नियम नीति के आधार नही रह सकता।
ईश्वर के चरित्र का वर्णन कहने सुनने से पाप का नाश हो जाता है।



7

पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रूचिर
कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ।

रेशम कीड़े से सुन्दर रेशमी वस्त्र बनता है।
इसलिये अत्यधिक अपवित्र कीड़े को भी लोग प्राणों के समान पालते हैं।

8

पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं
अति नीचहुॅसन प्रीति करिअ जानि निज परम हित।

वेदों की नीति और सज्जनों का कथन है कि आपको अपना अच्छा हि
तैसी जानकर अति नीच ब्यक्ति से भी प्रेम करना चाहिये।



9

अग जग जीव नाग नर देवा।नाथ सकल जगु काल कलेवा।
अंड कटाह अमित लय काटी।कालु सदा दुरति क्रम भारी।

नाग आदमी देवता सभी चर अचर जीव एवं यह सम्पूर्ण संसार काल का भोजन है।
समस्त ब्रम्हान्डों का विनाश करने बाला काल बड़ा आवश्यक तत्व है।

10

जेहि ते कछु निज स्वारथ होई।तेहि पर ममता करसब कोई।

जिसका जिसपर कुछ निजी स्वार्थ होता है उस पर सब कोई प्रेम करते हैं।

Tulsidas Dohe On Self Experience - तुलसीदास के दोहे आत्म अनुभव पर


11

बिनु विस्वास भगति नहि तेहि बिनु द्रवहि न रामु
राम कृपा बिनु सपनेहुॅ जीव न लह विश्राम।

विश्वास किये बिना भक्ति नही और प्रभु द्रवित होकर कृपा नही करते।ईश्वर
की कृपा बिना हम सपने में भी शान्ति नहीं पा सकते हैं।

12

निज सुख बिनु मन होइ कि धीरा।परस कि होइ विहीन समीरा।
कब निउ सिद्धि कि बिनु विस्वासा।बिनु हरि भजन न भव भय नासा।

निजी सुख बिना मन स्थिर नही हो सकता।वायु तत्व के बिना स्पर्श नही हो सकता।
विश्वास के बिना कोई सिद्धि नही प्राप्त हो सकती है।
बिना ईश्वर की भक्ति के संसार रूपी जन्म मृत्यु का डर नाश नही हो सकता है।

13

बिनु तप तेज कि कर विस्तारा।जल बिनु रस कि होइ संसारा।
सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई।जिमि बिनु तेज न रूप गोसांई।

तपस्या के बिना तेज नही फैल सकता।जल बिना संसार में रस नही हो सकता है।
विना ज्ञानियों की सेवा के सदाचार नहीं प्राप्त होता है।
बिना तेज के रूप की प्राप्ति नही हो सकती है।

14

बिनु विज्ञान कि समता आबइ।कोउ अवकास कि नभ बिनु पाबइ।
श्रद्धा बिना धर्म नहि होई।बिनु महि गंध कि पाबइ कोई।

मूल तात्विक ज्ञान बिना समता की भावना नहीं हो सकती।
आकाश के बिना क्या कोई अंत जान सकता है।
श्रद्धा के बिना धर्म नही जैसे कि पृथ्वी के बिना कोई गंध नही मालूम कर सकता है।

15

बिनु संतोश न काम नसाहीं।काम अछत सुख सपनेहुॅ नाहीं।
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा।थल बिहीन तरू कबहुॅ कि जामा।

संतोश बिना इच्छाओं का नाश और इच्छाओं के रहते स्वप्न में भी सुख नहीं हो सकता है।
बिना ईश्वर भक्ति के कामनाओं का विनाश नहीं हो सकता जैसे कि बिना धरती क्या पेड़ उग सकता है।

Tulsidas Dohe On Ego - तुलसीदास के दोहे अहंकार पर


16

कोउ विश्राम कि पाव तात सहज संतोश बिनु
चलैकि जल बिनु नाव केाटि जतन पचि पचि मरिअ।

स्वभावतः संतोश के बिना शान्ति नही मिल सकती।
करोड़ों उपाय करके मरते रहने पर भी क्या जल के बिना नाव चल सकती है।

17

बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ विराग बिनु
गावहिं बेद पुरान सुखकि लहिअ हरि भगति बिनु।

गुरू के बिना ज्ञान और वैराग्य के बिना ज्ञान कदापि नहीं हो सकता।
वेद और पुराण कहते हैं कि प्रभु की भक्ति के बिना सुख कदापि नही हो सकती।

18

पुरूस नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ
सर्वभाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ।

वह पुरूस नपुंसक स्त्री या चर अचर कोई जीव हो छल कपट छोड़कर
जो पूरे भाव से मुझे भजता है-वह परमात्मा को बहुत प्रिय है।

19

अखिल बिस्व यह मोर उपाया।सब पर मोहि बराबरि दाया।
तिन्ह महॅ जो परिहरि मद माया।भजै मोहि मन बच अरू काया।

यह अखिल संसार प्रभु का पैदा किया हुआ है।अतः सब उनकी समान दया है।
लेकिन इनमें भी जो सब अहंकार और माया छोड़कर मन वचन और शरीर से मुझे भजता है-

20

जौं सब कें रह ग्यान एकरस।ईश्वर जीवहिं भेद कहहु कस।
मायाबस्य जीव अभिमानी।ईस बस्य माया गुन खानी।

यदि जीवों में पूर्ण ज्ञान हो जाये तो फिर जीव और ईश्वर में भेद क्या रहेगा।
घमंडी जीव माया के अधीन सत्व रज तम तीनों गुणों के खान के कारण ईश्वर के नियंत्रण मे है।

Tulsidas Dohe On Devotion - तुलसीदास के दोहे भक्ति पर


21

सुनहु राम कर सहज सुभाउ।जन अभिमान न राखहिं काउ।
संसृत मूल सूलप्रद नाना।सकल सोक दायक अभिमाना।

यह प्रभु का स्वभाव है कि वे किसी भक्त में अभिमान नही रहने देते हैं।
यह घमंड जन्म मृत्यु रूपी संसार की जड़ है।यह अनेकों तकलीफों और सभी दुखों का दाता है।

22

ब्यापि रहेउ संसार महुॅ माया कटक प्रचंड
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाखंड।

सम्पूर्ण जगत में माया छायी हुई है।काम क्रोध और लोभ माया रूपी
सेना के सेनापति हैं और घमंड छल और पाखंड उसके सैनिक हैं।

23

कीट मनोरथ दारू सरीरा।जेहि न लाग घुन को अस धीरा।
सुत वित लोक ईसना तीनी।केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी।

मन की इच्छायें शरीर रूपी लकड़ीके घुन का कीड़ा है।ऐसा कौन बीर है जिसे यह घुन न लगा हो।
पुत्र धन इज्जत की तीन प्रबल इच्छायें किसकी बुद्धि को नही बिगाड़ा है।

24

मच्छर कहि कलंक न लाबा।काहि न सोक समीर डोलाबा।
चिंता साॅपिनि को नहि खाया ।को जग जाहि न ब्यापी माया।

डाह इरशया ने किसे कलंकित नही किया है।शोक की लहर ने किसे नही हिलाया है।
चिन्ता के साॅप ने किसे नही खाया है।संसार में ऐसा कोइ नही जिसे माया ने नही प्रभावित किया है।

25

गुन कृत सन्यपात नहि केही।कोउ न मान मद तजेउ निबेही।
जोबन ज्वर केहि नहि बलकाबा।ममता केहि कर जस न नसाबा।

अपने गुणों का बुखार किसे नही चढ़ता।किसी को मान और मद ने नही छोड़ा है।
यौवन के बुखार से कौन अपना नियंत्रण नही खोया है।
ममता ने किसकी प्रतिश्ठा का नाश नही किया है।

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